तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी मिलेा गुजारा भत्ता-सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली. 10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने ठीक वैसा ही फैसला दिया है जैसा कि 23 अप्रैल 1985 को शाहबानों के मामले में दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में साफ कर दिया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धार 125 के तहत अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है। शाहबानो मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह का फैसला दिया था। जस्टिस बीवी नागरत्ना औरे ऑगस्टिन जॉर्ज मसील की बेंच ने यह फैसला दिया है। दोनों जजों ने अलग-अलग फैसला सुनाया है। लेकिन दोनों की राय एक ही थी। दोनों जजों ने अपने फैसले में कहा है कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत तलाकशुदा मुस्लिम महिला अपने पूर्व पति से गुंजारा भत्ता पाने की याचिका दायर करने की हकदार है।
परिवार न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक का सफर
यह पूरा मामला शुरू होता है। 15 नवम्बर 2012 से उस दिन मुस्लिम महिला ने अपने पति का घर छोड़ दिया है। 2017 में महिला ने अपने पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए और 46 के तहत केस दर्ज कराया। इससे नाराज होकर पति ने महिला कोे 3 तलाक दे दिया। 28 सितम्बर 2017 को उनके तलाक को सर्टिफिकेट जारी हो गया।
दावा है कि तलाक के बाद इद्दत की अवधि तक पति ने महिला को हर महीने 15 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देने की पेशकश की। इद्दत की अवधि 3 महीने तक होती है। लेकिन महिला ने इसे लेने से इनकार कर दिया। इसके बजाय महिला ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की और सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने की मांग की. 9 जून 2023 को फैमिली कोर्ट ने हर महीने 20 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया। फैमिली कोर्ट के फैसले को पति ने तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी. 13 दिसंबर 2023 को हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। लेकिन हर्जाने की रकम 20 हजार से घटाकर 10 हजार रुपये कर दी.पूर्व पति ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने दलील दी कि एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है। मुस्लिम महिला पर 1986 का मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून लागू होता है। उसने ये भी दलील दी 1986 का कानून मुस्लिम महिलाओं के लिए ज्यादा फायदेमंद है।