एलएनआईपीई में हिन्दी कार्यशाला व अनुवाद प्रतियोगिता का आयोजन

ग्वालियर। लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा संस्थान में आयोजित सात दिवसीय हिन्दी सप्ताह कार्यक्रम के अनुसार आज अपराह्न डॉ. अरविंद दुबे (नेत्र विशेषज्ञ) के मुख्य आतिथ्य में हिन्दी कार्यशाला का आयोजन हुआ। समारोह में प्रो. जे.पी वर्मा (प्रभारी कुलपति, एलएनआईपीई) विशिष्ट अतिथि रहें।
समारोह के आरंभ मेंएम.पी सिंह (ज्वांइट रजिस्ट्रार, एलएनआईपीई) ने मुख्य अतिथि डॉ. दुबे व कुलपति प्रो. वर्मा का स्वागत किया। स्वागत समारोह के उपरांत कार्यशाला आरंभ हुई जिसमें मुख्य अतिथि डॉ. दुबे ने हिन्दी भाषा के विकास व विस्तार पर प्रकाश डाला। डॉ. दुबे ने कहा कि भाषा के विकास व विस्तार की पहली शर्त यह हैं कि भाषा का स्वरूप उदार हो। भाषा यदि उदार नहीं हैं तो एक तय समय या सीमा में वह बंधकर रह जाती हैं। हिन्दी की विशेषता ही उदारता हैं खड़ी बोली से शुरू हुई हिन्दी, उर्दु, अरबी, फारसी, क्षेत्रीय प्रयोग से लेकर हिंग्लिश तक परिवर्तित हुई और समय के साथ-साथ अपने स्वरूप को निखारती व विस्तृत करती रही। भाषा के विकास की दूसरी शर्त यह हैं कि भाषा स्वयं के रूढ़िपरक और अप्रचलित रूप को त्याग दें, हिन्दी ने समयानुसार स्वयं के रूढ़िपरक और अप्रचलित रूप को त्याग कर नया चोला पहना इसी कारण यह आज भी प्रासंगिक हैं। हिन्दी के विकास तीसरा प्रमुख कारण नई संरचनाओं व प्रयोगशीलता का सदैव स्वागत करना रहा।
हमारे समाज ने हिन्दी भाषा के प्रति जिस उदार रवैये को अपनाया इसी कारण से आप पांएगे कि आज देश का एक बड़ा वर्ग हिन्दी में बात व कार्य करने में तकलीफ महसूस नहीं करता। हिन्दी के लिए आज के परिदृश्य में अगर बात करें तो मेरे विचार से हमें क्लिष्ट हिन्दी के स्थान पर सरल हिन्दी या आम बोलचाल की हिन्दी पर अधिक जोर देना चाहिए। हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि हिन्दी का कोई ऐसा शब्द जो अधिक प्रचलित नहीं हैं और अगर उसके स्थान पर यदि उर्दु या अंग्रेजी के शब्द कार्य कर सकते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं हैं, जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हुं भाषा का उदार होना आवश्यक हैं। डॉ. दुबे ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के व्यक्तित्व पर भी एक ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया जिसमें उन्होने महात्मा गांधी द्वारा लिए गए निर्णयों के अनुसार उनके व्यक्तित्व को सभा के सामने प्रस्तुत किया। डॉ. दुबे ने महात्मा गांधी के व्यक्तित्व व उनके विचार के प्रति सभा के संदेहों को भी अपने जवाबों के माध्यम से दूर किया।