नामान्तरण से तय नहीं होता है जमीन का मालिकाना हक-हाईकोर्ट
ग्वालियर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच की एकलपीठ ने जमीन के नामान्तरण से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि राजस्व अभिलेखों में किया गया म्यूटेशन किसी व्यक्ति के स्वामित्व हक का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने कहा है कि नामान्तरण की प्रक्रिया केवल राजस्व और कर निर्धारण के उद्देश्य से होती है। जबकि वास्तविक मालिकाना हक का निर्णय सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।
जमीन का मामला मुरैना जुडा
यह मामला मुरैना के ग्राम हिंगोना खुर्द स्थित भूमि से संबधित है। याचिकाकर्ता जंडेल शर्मा ने SDO कार्यालय मुरैना द्वारा 10 अप्रैल 2019 का पारित आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। एसडीओ ने एक रजिस्टर्ड एक्सचेंज डीड के आधार पर विपक्षी पक्ष का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करने की अनुमति दी थी।
बंटवारे को लेकर विवाद
याचिकाकर्ता का कहना था कि विवादित जमीन उनके दिवंगत चाचा हरगोविंद की थी, जिन्होंने उनके पक्ष में वसीयत छोड़ी थी। साथ ही उन्होंने तर्क दिया कि बंटवारे का आदेश पहले ही कमिश्नर चंबल संभाग द्वारा निरस्त किया जा चुका है और मामला हाईकोर्ट में लंबित है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि एसडीओ ने उपलब्ध रिकॉर्ड और पंजीकृत विनिमय पत्र के आधार पर नामांतरण किया था। कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया में किसी प्रकार की गंभीर त्रुटि या अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन नहीं हुआ है। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में किया गया नामांतरण अंतिम स्वामित्व अधिकार निर्धारित नहीं करता। भूमि के वास्तविक अधिकारों का अंतिम निर्णय केवल सक्षम सिविल न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है।