पुलिस सेवा में अनुकंपा नियुक्ति के लिये ससम्मान बरी होना जरूरी-हाईकोर्ट
ग्वालियर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि पुलिस जैसे अनुशासित विभाग में अनुकम्पा नियुक्ति के लिये सिर्फ आपराधिक मामलों से बरी होना ही पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट कियाहै कि अभ्यर्थी की दोषमुक्ति ‘‘ससम्मान’’ होनी चाहिये। यदि किसी मामले में आरोपी गवाहों के मुकर जाने, सबूतों के अभाव या समझौते के आधार पर छूटता है तो उसे पूर्णतः निर्दोश नहीं माना जायेगा। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डबल बेंच ने योगेश शर्मा की रिट अपील खारिज करते हुए यह आदेश पारित किया है। योगेश के पिता पुलिस विभाग में पदस्थ थे। नौकरी के बीच में उनकी मृत्यु हो गयी थी। इसके बाद योगेश ने आरक्षक पद पर अनुकम्पा नियुक्ति के लिये आवेदन किया था। चरित्र सत्यापन के दौरान उसके खिलाफ 3 आपराधिक प्रकरण सामने आये। इनमें धारा 379 और 325 के तहत चोरी और गंभीर मारपीट जैसे आरोप शामिल थे।
क्या है मामला
पुलिस विभाग ने 11 जुलाई 2017 को उसका आवेदन निरस्त करते हुए कहा था कि वह तकनीकी आधार पर बरी हुआ है, इसलिए पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि अभियोजन पक्ष गवाह प्रस्तुत करने में असफल रहता है या गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं, तो आरोपी को केवल संदेह का लाभ मिलता है। इसे “ससम्मान दोषमुक्ति” नहीं कहा जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि किसी पद के लिए पात्रता और उपयुक्तता दोनों अलग-अलग पहलू हैं। अदालत चयन प्रक्रिया की वैधता की समीक्षा कर सकती है, लेकिन विभाग के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं कर सकती कि कौन व्यक्ति पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी अभ्यर्थी का आपराधिक रिकॉर्ड रहा है, तो नियोक्ता को यह तय करने का अधिकार है कि वह भविष्य में भरोसेमंद साबित होगा या नहीं। साथ ही चोरी और मारपीट जैसे मामलों को अदालत ने नैतिक अधमता से जुड़े गंभीर अपराध माना।