संदर्भ: 31 अगस्त ‘रूरल इंडिया’ के संपादक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं गोपालकृष्ण पुराणिक की पुण्यतिथि

संदर्भ: 31 अगस्त ‘रूरल इंडिया’ के संपादक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं गोपालकृष्ण पुराणिक की पुण्यतिथि।jग्राम विकास, स्वावलंबी शिक्षा के पुरोधा पं गोपालकृष्ण पुराणिक-संतोष शर्मासमूचे देश में स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु प्रत्येक भारतवासी अपना सर्वस्व समर्पित करने हेतु तन, मन, धन से आहुत होने के लिये तैयार था। आंदोलन की लहर समूचे देश में ग्रामीण स्तर तक पहुंच चुकी थी। ऐसे में जब अंग्रेजों के बनाए गए भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 का सहारा लेकर अंग्रेज सरकार स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए अमानवीय यातनाओं, जेल एवं फांसी की सजा का भरपूर उपयोग कर रही थी, तब भारतमाता का एक लाल पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक जिनका जीवन संघर्ष उनके जन्म से ही प्रारंभ था, ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपने जीवन को आहुत करने का संकल्प किया। संकल्प के साथ ही महज 19 वर्ष की आयु में पोहरी से नागपुर तक की यात्रा की। न केवल यात्रा की बल्कि सन 1920 में अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन नागपुर में सम्मिलित होकर, राजनैतिक आंदोलन के साथ-साथ चलने वाले रचनात्मक आंदोलन को अपने जीवन का उद्देश्य बनाकर कार्य करना प्रारंभ कर दिया जो कि आजीवन 1 अगस्त, 1965 तक जारी रहा।
पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक का जीवन 9 जुलाई, 1900 से ही संघर्षों के साथ मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले स्थित पोहरी तहसील के छोटे से गांव छर्च में प्रारंभ हुआ। महज तीन वर्ष की आयु के थे, तब पिता नरहरि प्रसाद पुराणिक का निधन हो गया। उनके पालन का जिम्मा पितामह पं वासुदेव पुराणिक ने निभाया। वासुदेव संस्कृत और ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। संस्कृत में लिखित कई ग्रंथ, वेद, पुराण, भागवत गीता उनके व्यक्तिगत पुस्तकालय का हिस्सा थे। ऐसे माहौल में पढ़ना-लिखना गोपालकृष्ण पुराणिक का स्वाभाविक हिस्सा हो गया। जब वे महज 19 साल के थे, तब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन के लिए निकल पड़े। कई दिनों तक भूखे-प्यासे रहकर, सड़कों पर रात बिताकर नागपुर पहुंचे। अधिवेशन के उपरांत उन्होने अपने जीवन को रचनात्मक आंदोलन में लगा दिया। पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक ने 1921 में एक आदर्श विद्यालय की स्थापना अपने क्षेत्र भटनावर ग्राम में की। यहां विद्यार्थियों को सिर्फ कॉन्वेंट स्कूल की शिक्षा ही नहीं दी जाती थी, बल्कि उन्हें स्वावलंबी शिक्षा के साथ-साथ व्यायाम, स्वच्छता आदि का दैनिक जीवन में उपयोग एवं उसके लाभ बताये जाते थे। जैसा कि प्राचीन भारत के गुरूकुलों में शिष्यों को आत्मनिर्भर बनाया जाता था। आदर्श विद्यालय के साथ ही गोपालकृष्ण पुराणिक ने खादी के विकास एवं निर्माण हेतु परियोजना तैयार की। स्वयं खादी का प्रयोग प्रारंभ किया। 1930 में देश में सत्याग्रह प्रारंभ हुआ, तो उसमें अपना योगदान देने हेतु दिल्ली पहुंचे। सत्याग्रही बृजकांत चांदीवाला एवं कृष्णन नायर के साथ मिलकर सत्याग्रही शिविर के संचालन में सहयोग करने लगे। दिल्ली के नरेला इलाके में सत्याग्रहियों को भाषण देने के दौरान अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। गोपालकृष्ण पुराणिक के विरुद्ध अंग्रेजी अदालत में मुकदमा चलाया गया, परंतु साक्ष्यों के अभाव में उन्हें रिहा करना पड़ा। इसके बाद वे पोहरी वापस आ गये और उन्होंने ग्राम विकास के कार्यों को पोहरी के साथ ही अलग-अलग स्थानों पर प्रारंभ किया।
पं.गोपालकृष्ण पुराणिक ने केशवदत्त शास्त्री के सानिध्य में 1911 से 1915 तक राष्ट्रवाद एवं अंग्रेजी की शिक्षा ग्रहण की थी। यही नहीं नई दिल्ली में रहते हुए लाला लाजपत राय, राय बहादुर प्यारेलाल, स्वामी सहजानंद, विपिनचंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक, ऐनीबेसेंट, पं मोतीलाल नेहरू आदि के संपर्क में आकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। अपने उन्हीं संपर्काे के चलते रायबहादुर प्यारेलाल के सुपुत्र रघुनंदन, जो कि कैंब्रिज विश्वविद्यालय से पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ अध्ययन करके वापस आये थे। उन्होंने 1923 से अपनी सेवायें आदर्श विद्यालय को देना प्रांरभ कीं। जिसका नतीजा यह हुआ कि सात विद्यार्थियों के साथ प्रारंभ किया गया आदर्श विद्यालय, उत्तरोत्तर प्रगति पथ पर अग्रसर होता चला लगा। आदर्श विद्यालय में भारतभर से ही नहीं श्रीलंका, वर्मा, नेपाल आदि से भी विद्यार्थी अध्ययन हेतु आने लगे। ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के हीरो पं. रामप्रसाद बिस्मिल भी कुछ दिन पोहरी रहे। पं.गोपालकृष्ण पुराणिक ने उन्हें आदर्श विद्यालय में शिक्षक के रूप में रखकर उनकी सहायता की। कुछ समय तक बिस्मिल ने आदर्श विद्यालय में नाम परिवर्तन कर, शिक्षक के रूप में अपनी सेवाऐं दीं।
पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक स्वदेशी एवं ग्राम विकास की परिकल्कना को साकार करने हेतु अपने पथ पर अग्रसर थे। वर्ष 1928 में वे आदर्श विद्यालय के एक छात्र रतिराम को लेकर खादी बनाने का प्रशिक्षण लेने हेतु महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम पहुंचे। रतिराम ने साबरमती आश्रम में रहकर न केवल खादी बनाने का प्रशिक्षण लिया, अपितु खादी बनाने में उपयोग किये जाने वाले यंत्रों को बनाना एवं उन्हें तकनीकि रूप से उन्नत करने का कार्य भी किया। उनके हाथ में ऐसा हुनर था कि स्वयं महात्मा गांधी ने अपनी पत्रिका ‘यंग इंडिया’ में उनके विषय में एक लेख लिखा। जिसमें उनकी भरपूर प्रशंसा की गई थी। जब 1929 में रतिराम अपना प्रशिक्षण पूर्ण कर पुनः वापस आये, तब क्षेत्र में कहीं भी खादी का कार्य बडे़ पैमाने पर नहीं होता था। पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक ने खादी निर्माण हेतु एवं आदर्श विद्यालय विस्तार हेतु कार्य योजना पर कार्य करना शुरू कर दिया। पोहरी के तत्कालीन जागीरदार राव राजेन्द्र मालौजीराव नृसिंहराव सीतौले इस कार्य में तन-मन-धन से सहयोग करने को आगे आए। पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक को उन्होंने पोहरी में न केवल भूमि निःशुल्क प्रदान की, अपितु आदर्श विद्यालय भवन, खादी भण्डार एवं महाविद्यालय भवन का निर्माण में भी मदद की।
आदर्श विद्यालय दस वर्ष उपरांत 1931 में पोहरी स्थानांतरित कर दिया गया। जहां शिक्षा के अलावा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर जोर दिया जाता था। यही नहीं खादी का उत्पादन भी प्रारंभ हो चुका था। इस इलाके में बारीक अंक की खादी बनती थी। उज्जैन प्रदर्शनी के दौरान तत्कालीन ग्वालियर रियासत के श्रीमंत जीवाजीराव सिंधिया को खादी का थान भेंट किया गया, तो उन्हांने भी उसकी प्रशंसा की। ग्वालियर व्यापारिक मेले के दौरान बारीक खादी को सोने का तमगा एवं कई पुरस्कार मिले। पोहरी की खादी को प्रदर्शनी के दौरान अंतिम वायसराय तथा प्रथम गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन, लेडी माउंटबेटन एवं उनकी पुत्री पामेला को 70 अंक की खादी भेंट की गई, तो उन्होंने 31 दिसंबर, 1947 को बाकायदा पत्र लिखकर इसकी प्रशंसा की। 70 अंक का सूत कातने वाली खोड़ गांव की महिला गेंदाबाई थीं। जिनके हाथ से बना सूत समानरूप होता था। इस सूत की बुनाई का कार्य एक विशेष कारीगर नंदुआ से कराई जाती थी। उसके हाथ की बनी मलमल की प्रदर्शनियों, मेलों आदि में विशेष मांग रहा करती थी। खादी के साथ ही हाथ कागज, माचिस, शहद आदि का उत्पादन भी खादी भण्डार पोहरी में प्रारंभ कर दिया गया। जिसके लिये पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक अपने शिष्यों को प्रशिक्षण हेतु देश के विभिन्न स्थानों पर भेजते थे। विद्यार्थियों को शिक्षा के उच्चतम स्तर तक ले जाना ही आदर्श सेवा संघ का एकमेव ध्येय था।
पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक ने नवंबर 1938 में ‘रूरल इंडिया’ नाम से एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ किया। जो कि ईश्वरदास मेंशन, नाना चौक मुम्बई से निकलती थी। अंग्रेजी में प्रकाशित ‘रूरल इंडिया’ में उस वक्त महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, पट्टाभि सीतारमैया, विजयलक्ष्मी पंडित, गोविंदवल्लभ पंत, जवाहरलाल नेहरू, काका कालेलकर, हरिभाऊ उपाध्याय, भारतन कुमारप्पा जैसे चर्चित नेता लेख लिखते थे। इसके अलावा अन्य देशों के विद्यजन जैसे मिस्टर हूवर, एसटी मोजेज, राल्परिचर्ड कैथल, एव्ही मैथ्यू भी अपने लेख ‘रूरल इंडिया’ में प्रकाशन हेतु उपलब्ध कराते थे। प्रोफेसर एनजी रंगा ‘रूरल इंडिया’ पत्रिका के संचालक मंडल के अध्यक्ष थे। ‘रूरल इंडिया’ प्रकाशन के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन में भी पंडित गोपालकृष्ण पौराणिक की बराबर भागीदारी बनी रही। साल 1947 में देश स्वतंत्र होने के उपरांत पौराणिक ‘रूरल इंडिया’ का संपादन कार्य पूर्ण रूप से देखने लगे। पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक ने किदवई व कृपलानी की ‘किसान मजदूर प्रजा पार्टी’ में कुछ समय अपना राजनैतिक सहयोग प्रदान किया।

‘समाजवादी प्रजा पार्टी’ में उसके विलय के उपरांत उन्होंने राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी के साथ कार्य किया। इन सब राजनीतिक गतिविधियों के बाद भी वे अपना ज्यादातर समय ‘रूरल इंडिया’ के लिए दिया करते थे। सत्तर के दशक में पाठकों की मांग पर इस पत्रिका में आठ पृष्ठ हिंदी में प्रकाशित किए जाने लगे। देश की स्वतंत्रता के बाद पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक ने कभी स्वतंत्रता संग्राम सैनानी की पेंशन एवं अन्य लाभों को प्राप्त नहीं किया। आजीवन देश सेवा में लगे रहे। अंत समय में जब स्वास्थ्य अत्याधिक गिरता गया, तो पोहरी आये। 31 अगस्त, 1965 को शिवपुरी जिला अस्पताल में पंडित गोपालकृष्ण पौराणिक का देहांत हो गया। निधन के दूसरे दिन उनका पार्थिव शरीर पोहरी आदर्श विद्यालय परिसर में दर्शनार्थ रखा गया। जहां हजारों की संख्या में ग्रामवासी उन्हें श्रद्धांजलि देने उपस्थित रहे। देश के स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी, ग्राम विकास, स्वावलंबी शिक्षा के पुरोधा और ‘रूरल इंडिया’ जैसी वैचारिक पत्रिका के संपादक पंडित गोपालकृष्ण पुराणिक को विस्मृत नहीं किया जा सकता।

पोहरी जिला शिवपुरी (म. प्र.)
मोबाइल एवं व्हाट्सएप: 91793 18218
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(लेखक परिचय: साल 2001 से विभिन्न समाचार पत्रों में पत्रकारिता और विविध विषयों पर लेखन)