मां रतनगढ़ सिंचाई परियोजना में पाइप बिछाये बिना ही कंपनी ने लिया 412 करोड़ रूपये का भुगतान, जांच के लिये पहुंची टीम
विधानसभा चुनाव 2018 की आचार संहिता लगने के महज 24 घंटे पूर्व जिस परियोजना के जरिये दतिया, भिण्ड और ग्वालियर जिलों के किसानों को 78 हजार 484 हैक्टर जमीन को सिंचित करने का सपना दिखाया गया, उस परियोजना का काम अब तक शुरू नहीं हो सका है।
हालांकि 5 वर्ष में जिस कम्पनी को पाइप बिछाने थे, उसने पाइप डाले बगैर ही मप्र सरकार से 412 करोड़ रूपये का भुगतान ले लिया और फिर भी काम शुरू नहीं किया गया है जबकि कागजों में मटेरियल दिखाया गया। इस मामले की शिकायत के बाद रविवार को अपर सचिव विकास नरवाल समेत जल संसाधन विभाग के अन्य अधिकारियों की टीम ने मामले की जांच शुरू की गयी है। उन्होंने दतिया के राजघाट कार्यालय में बैठक ली और कम्पनी के प्लांट पर पहुंचकर मटेरियल की स्थिति देखी। अधिकारियों ने बताया है कि फिलहाल मामले की जांच चल रही है। जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।
मां रतनगढ बहुउद्देशीय परियोजना
मां रतनगढ़ बहुउद्देशीय परियोजना से 3 जिलों की वर्षों पुरानी सिंचाई की समस्या का समाधान होना है। इस परियोजना पर शासन 2244ण्97 करोड़ का बजट खर्च कर रही है। परियोजना के जरिए कुल 78484 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचित करने का प्लान है। यह परियोजना सेंवढ़ा से महज 5 किलोमीटर दूर डांग डिरोली में स्थापित होनी है। परियोजना के लगने से सेंवढ़ा की महज 6500 हेक्टेयर कृषि भूमि सिंचित होगी। जबकि सर्वाधिक लाभ पड़ोस के भिंड जिले को हैए जिसकी 49200 हेक्टेयर तथा ग्वालियर जिले की 22784 हेक्टेयर कृषि भूमि को सूखे की समस्या से निजात मिलेगी। 26 जून 2018 को जल संसाधन विभाग ने परियोजना की प्रशासकीय स्वीकृति जारी की थीए परियोजना का नाम मां रतनगढ़ बहुउद्देशीय परियोजना रखा गया।
अधिकारियों ने शुरू की जांच
रविवार को अपर सचिव विकास नरवालए चीफ इंजीनियर चंद्रशेखर खटोले सहित अन्य अधिकारी दतिया पहुंचे। राजघाट कालोनी स्थित सिंचाई विभाग के कार्यालय में 3 घंटे तक बैठक ली। इस दौरान रतनगढ़ परियोजना सहित अन्य परियोजना पर चर्चा हुई। तकनीकी खामियों की जानकारी लेने के बाद अधिकारियों की टीम पिछोर स्थित मेंटेना कंपनी के प्लांट की जांच करने पहुंची। यहां कंपनी द्वारा कागजों में दर्शाए गए मटेरियल के स्टॉक व मौके पर मौजूद मटेरियल के स्टॉक की जांच की जानी थी। हालांकि कागजों में कितना मटेरियल स्टॉक दिखाया गया है और प्लांट में कितना मटेरियल का स्टॉक उपलब्ध हैए इसकी जांच अभी नहीं हो सकी। अधिकारियों का कहना है कि उनके पास अभी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हो सका है।
पिछोर प्लांट की जांच में स्टॉक का रिकॉर्ड नहीं मिला, अब फिजीकल वेरीफिकेशन
यह हुई गड़बड़ी… एक साल बाद शुरू हुई जांच
पाइप बिछाने का ठेका मेंटेना कंपनी को दिया गया। इसके लिए 831 करोड़ का ठेका हुआ। इसमें पम्प हाउस का निर्माण करना भी शामिल था। चूंकि डेम नहीं बना तो पम्पहाउस का बनना और पाइप का डालना भी बेमानी था। पर भ्रष्टाचार की जद में आई योजना के अधिकारियों ने मेंटेना कंपनी को पाइप डालने के नाम पर 412 करोड़ का भुगतान कर दिया। यह भुगतान पिछले वित्तीय वर्ष में मार्च 2020 तक तीन किस्तों में किया गया। मामला उजागर होते ही जांच चालू हुई। जल संसाधन विभाग द्वारा प्रदेश स्तर की जांच समिति बनाई पर एक वर्ष गुजरने के बाद भी जांच नहीं हो पाई है। परियोजना प्रशासक अनिल दीक्षित के अनुसार कोरोना के चलते जांच में देरी हो रही है। वैसे भुगतान पाइप के एवज में हुआ है और पाइप कंपनी की निर्माण साइट पिछोर में बन कर तैयार रखे हैं। हालांकि जांच में देखा जाएगा कि पाइप मौजूद हैं या नहीं।
जमीन का पेंच -1248 हेक्टेयर भूमि अभी नहीं मिली
सेंवढ़ा क्षेत्र की 35 हजार हेक्टेयर जमीन इस परियोजना के निर्माण बावत अधिग्रहित की जा रही है। इसमें से राजस्व के हिस्से की लगभग 1100 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा लिया जा चुका है। 766 निज भू स्वामियों की जमीन को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया अभी प्रारंभ नहीं हुई है। वहीं वन विभाग की 1248 हेक्टेयर जमीन जिसमें नदी का क्षेत्र भी शामिल है, जाे डेम के लिए उपयोग में ली जा रही है। इसी जमीन पर पेंच फंसा हुआ है। चूंकि दतिया जिले में इतनी जगह उपलब्ध नहीं है इसलिए पहले भिंड जिले में राजस्व जमीन को वन विभाग के लिए हस्तांतरित करने की प्रक्रिया चली। जमीन के कागजात बन गए पर वन विभाग ने इसे प्लांटेशन के लिए उपयुक्त नहीं माना।
बता दें कि वन अधिकार अधिनियम के तहत वन विभाग की जमीन किसी सार्वजनिक प्रयोजन के लिए ली जाती है तो वन विभाग को उतनी ही जगह देनी होती है, जहां विभाग प्लांटेशन करता है। भिंड जिले की जमीन को ऊंची नीची बताकर वन विभाग ने लेने से इंकार किया, तो एलएनटी कंपनी के साथ जल संसाधन विभाग ने दूसरी जगह तलाशना प्रारंभ कर दिया। शिवपुरी जिले में 1300 हेक्टेयर जगह देखी गई। वन विभाग को जमीन जगह उपयुक्त भी लगी पर एक वर्ष से शिवपुरी जिले के पटवारी, आरआई और तहसीलदारों के बीच में ही जमीन हस्तांतरण की प्रक्रिया अटकी है।
परियोजना एक नजर में
शिलान्यास: 5 अक्टूबर 2018 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वीडियो कान्फ्रेंसिंग के जरिए भूमिपूजन समारोह को संबोधित किया। समारोह के महज 24 घंटे बाद यानि 6 अक्टूबर को आदर्श आचार संहिता लागू हो गई थी।
निर्माण स्थल: सेंवढ़ा से 7 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम डांग डिरोली
लागत: 2245 करोड़। इसमें डेम निर्माण के लिए एलएनटी कंपनी को 377 करोड़ का ठेका दिया गया। तीन वर्ष में कार्य पूर्ण करने की मियाद थी। 32 माह गुजर गए पर जगह नहीं मिली। दूसरा ठेका कैनाल निर्माण के लिए मेंटेना कंपनी को 831 करोड़ का ठेका दिया गया। इस कंपनी ने पाइप निर्माण के नाम पर 412 करोड़ का भुगतान ले लिया। अभी साइट पर कहीं भी पाइप नहीं डाले गए। लगभग एक हजार करोड़ रुपए का प्रावधान डूब क्षेत्र में आने वाले लोगों के विस्थापन और विद्युत परियोजना के लिए खर्च होना है।