109 साल पुरानी गवर्नमेंट प्रेस बंद हाेगी इमारत स्मार्ट सिटी काे मिलेगी; 159 कर्मचारियों को दिए जाएंगे दूसरे दफ्तरों के विकल्प
महाराज बाड़ा स्थित 109 साल पुरानी गवर्नमेंट प्रेस जल्द बंद कर दी जाएगी। सिंधिया रियासत द्वारा 1912 में स्थापित इस प्रेस में जयाजी प्रताप अखबार प्रकाशित, राज्य के हुक्मराने और गजट आदि का प्रकाशन हाेता था। बाद में यहां निर्वाचन की गोपनीय सामग्री सहित सरकारी दस्तावेज का प्रकाशन किया जाने लगा। अभी यहां नगरीय निकाय चुनाव की पीठासीन व सेक्टर अधिकारियों की 30 हजार डायरियों का प्रकाशन व जिल्दसाजी का काम चल रहा है।
बाड़ा सहित इंदौर, रीवा के गवर्नमेंट प्रेस बंद करने का आदेश गुरुवार को कर दिए गए। प्रेस के कर्मचारियों की पद स्थापना को लेकर आठ सदस्यीय संभाग स्तरीय कमेटी बनी है। इसमें अध्यक्ष संभाग आयुक्त होंगे जबकि सदस्य के रूप में कलेक्टर, जिला पंजीयक, कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण, नियंत्रक गवर्नमेंट प्रेस द्वारा मनोनीत कोई तीन सदस्य रहेंगे। सचिव के रूप में भी गर्वनमेंट प्रेस के अधिकारी को तैनात किया जाएगा।
नीलाम की जाएगी संपत्ति
गवर्नमेंट प्रेस महाराज बाड़ा की बिल्डिंग को स्मार्ट सिटी काॅर्पारेशन ने मांगा है। इसके अलावा जो भी और संपत्ति होंगी, उन्हें नीलामी के माध्यम से विक्रय किया जाएगा। गवर्नमेंट प्रेस परिसर का स्वामित्व राजस्व विभाग के पास ही रहेगा।
प्रदेश में 495 खाली पद खत्म किए गए
ग्वालियर सहित इंदौर व रीवा के गवर्नमेंट प्रेस में कुल 1286 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 495 अभी खाली हैं। इन खाली पदों को सरकार ने खत्म कर दिया है। वर्तमान में काम कर रहे 67 कर्मचारियों को राजस्व विभाग में भेजा जाएगा। कुल 185 पदों को सांख्येत्तर रखा गया है। कुल 114 श्रेणी के पदों को 13 श्रेणियों अर्थात 8 तकनीकी एवं 5 गैर तकनीकी में रखा जाएगा। भविष्य में सिर्फ 7 श्रेणियों के खाली पद ही भरे जाएंगे।
आलीजाह दरबार टोकन आज भी प्रचलित
गवर्नमेंट प्रेस में काम करने वाले कर्मचारी बताते हैं कि वर्तमान में काम करने वाले जो कर्मचारी अनपढ़ हैं उन्हें हाजिरी लगाने के लिए आज भी सिंधिया रियासत की तरह आलीजाह दरबार के नाम से टोकन दिए जाते हैं। इसी से काम का हिसाब लगाकर उनका वेतन निकाला जाता है।
सरकार के दस्तावेज किए जाते थे प्रिंट
1912 में गवर्नमेंट प्रेस बिल्डिंग का निर्माण हुआ था। पहले यहां जयाजी प्रताप अखबार सहित सरकार के सभी दस्तावेज छापे जाते थे जो बाद में मप्र संदेश के नाम से प्रिंट होने लगा था।
-रमाकांत चतुर्वेदी, पुरातत्वविद