सिंधिया और सांसद केपी की लड़ाई में करोड़ों के प्रोजेक्ट को नहीं मिल पा रही पहचान
गुना. केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रयासों से मप्र में छिंदवाड़ा के बाद गुना जिले की बमौरी विधानसभा के हरिपुर गांव में एक सौ दस करोड़ रुपए की लागत से निर्मित खुला एफडीडीआई (फुटवियर डिजाइन एण्ड डवलपमेन्ट इंस्टीट्यूट)दम तोड़ता नजर आ रहा है।इसकी वजह ये है कि दूर-दराज क्षेत्रों के बच्चे बहुत कम कनेक्टीविटी न होने के कारण यहां नहीं आ रहे हैं, प्रचार-प्रसार के अभाव में यहां बच्चे भी प्रवेश नहीं ले रहे हैं। कुल मिलाकर ये है कि युवाओं को रोजगार दिलाने का सपना जो ज्योतिरादित्य सिंधिया ने देखा था वो यहां पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। सिंधिया के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर ध्यान देने के लिए यहां का स्टॉफ वर्तमान सांसद डा. केपी यादव से भी मिला और उनसे यहां अधिक से अधिक युवा प्रवेश लें इसके लिए वे युवाओं को प्रेरित करें इसका आग्रह भी किया था, लेकिन उन्होंने भी सिंधिया के प्रोजेक्ट होने से उस पर ध्यान नहीं दिया। यह प्रोजेक्ट भी सिंधिया-केपी की राजनीतिक लड़ाई में अपनी पहचान खोता जा रहा है।
सिंधिया के प्रयासों से यहां खुला था भवन
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने संसदीय क्षेत्र को एक सौगात के रूप में पांच -वर्ष पूर्व गुना में फुटवियर डिजाइन एण्ड डवलपमेन्ट इंस्टीट्यूट खुलवाने के प्रयास किए थे। जिसके तहत जमीन की तलाशी गई, इसके लिए तीन स्थान नियत हुए थे। जिसमें एक स्थान गुना रेलवे स्टेशन से दो-ढाई किलोमीटर दूर ही था। शहर से बारह किलोमीटर दूर यानि बमौरी विधानसभा के हरिपुर गांव में सरकारी भूमि चिन्हित कराकर फायनल कराया। उनका स्वार्थ यह था कि यहां इंस्टीट्यूट खुलेगा तो उनकी निजी जमीनों के दाम ऊंचे हो जाएंगे। ऐसा तो हुआ, लेकिन शहर से दूर और अपराधी बाहुल्य क्षेत्र हरिपुर में खोला गया यह इंस्टीट्यूट अपने प्रचार-प्रसार के अभाव में और बच्चों के प्रवेश न लेने से सिंधिया द्वारा देखे गए युवाओं को फुटवियर डिजाइन का कोर्स कराकर स्वरोजगार उपलब्ध करा पाने संबंधी योजना का सपना पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। हां हरिपुर के लोगों को यह फायदा हुआ कि उनकी जमीन के दाम जरूर बढ़ गए थे और उनको इंस्टीट्यूट बनाने के एवज में जमीन देने के बदले अच्छा पैसा भी मिला था।
घाटे में चल रही है संस्था
संस्थान के प्रमुख आरके सिंह मानते हैं कि यहां बच्चों की संख्या और स्टॉफ पर होने वाले खर्चे के अनुपात में गुना में संस्था घाटे में चल रही है। वैसे अधिकतर जगह ऐसी इंस्टीट्यूट मेट्रो सिटी में हैं, केवल यहीं ग्रामीण क्षेत्र में खुली है। उसकी वजह कुछ भी हो सकती है। कम प्रवेश की वजह प्रचार-प्रसार और जागरूकता का अभाव बताया। यहां प्रवेश बढ़े इसके लिए हम सांसद डा. केपी यादव से भी मिले थे, लेकिन उन्होंने भी कोई रूचि नहीं ली थी।