डकैती अधिनियम को पूर्व गृहमंत्री ने दी चुनौती, डकैती नहीं फिर भी हुई 1000 एफआईआर, हाईकोई ने गृहसचिव, डीजीपी और 6 जिलों के एसपी से मांगा जवाब

ग्वालियर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने ‘‘मध्यप्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम’’ 1981’’ की संवैधानिकता को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष व पूर्व गृहमंत्री डॉ. गोविंद सिंह की जनहित याचिका पर मगलवार को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने गृह विभाग के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक और ग्वालियर, शिवपुरी, भिंण्ड, दतिया, श्योपुर और मुरैना के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
सभी को 4 सप्ताह में अपना जवाब देना है। उसके बाद अगली सुनवाई होगी। जनहित याचिका में इस कठोर कानून का असंवैधानिक (अल्ट्रा वायर्स) घोषित कर निरस्त करने की मांग की गयी है।
ग्वालियर-चंबल संभाग में कोई गैंग सक्रिय नहीं, फिर भी FIR
पिछले 6 वर्षो में हाईकोर्ट में 1000 एफआईआर पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पूर्व गृहमंत्री डॉ. गोविंद सिंह के सीनियर एडवोकेट राजीव शर्मा ने दलील दी कि जब राज्य सरकार और गृह विभाग स्वयं विधानसभा के पटल पर स्वीकार कर चुके है। प्रदेश में काई भी सूचीबद्ध डकैत गैंग सक्रिय नहीं है। तब इस पर 45 वर्ष पुराने कानून को लागू रखना पूरी तरह अप्रासंगिक है।
6 जिलों के एसपी और गृह विभाग को नोटिस जारी
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए गृह विभाग के आला अफसरों सहित अंचल के प्रमुख जिलों के पुलिस कप्तानों को नोटिस जारी कर इस अधिनियम के इस्तेमाल और औचित्य पर विस्तृत जवाब मांगा है।
फर्जी मुकदमों का आरोप: वर्ष 2020 से अब तक ग्वालियर-चंबल अंचल के 6 जिलों शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, भिंड, मुरैना व श्योपुर में इस कानून के तहत 1,000 से अधिक एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं।
मामूली रंजिश में धारा 11/13 डकैती अधिनियम: आरोप लगाया गया है कि पुलिस आपसी रंजिश, जमीन-जायदाद के छोटे-मोटे विवाद या मामूली मारपीट की घटनाओं में भी इस दस्यु अधिनियम की धारा 11 और 13 जोड़कर निर्दोष ग्रामीणों, किसानों और युवाओं को फंसा रही है।
अग्रिम जमानत पर रोक: याचिका में इस अधिनियम की सबसे कठोर व्यवस्था धारा 5(1) को चुनौती दी गई है, जिसके तहत आरोपी को अग्रिम जमानत मिलने पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है।
बिना जांच सीधे जेल: पुलिसिया मनमर्जी से दस्यु धाराएं जुड़ते ही आरोपी को बिना किसी निष्पक्ष प्रारंभिक जांच के सीधे जेल जाना पड़ता है।
मौलिक अधिकारों का हनन: अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद-21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करती है।