देश के दस शीर्ष विश्वविद्यालयों में होगा मिजोरम केन्द्रीय विश्वविद्यालय :कुलपति प्रो.सम्बाशिवा राव

मिजोरम केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर केआरएस संबाशिवा राव इस विश्वविद्यालय को देश के दस शीर्ष विश्वविद्यालयों में शामिल कराने के लिए प्रयासरत हैं और उन्हें विश्वास है कि विश्वविद्यालय जल्द ही यह मुकाम हासिल
कर लेगा। वरिष्ठ संवाददाता वंदना विश्वकर्मा ने इस दिशा में किये जा रहे उनके कार्यों, को मिजोरमवासियों के कल्याण के लिए किए जा रहे उनके प्रयासों तथा उनके व्यक्तिगत जीवन और उपलब्धियों के बारे में उनसे विस्तारपूर्वक बातचीत की।
प्रश्न -मिजोरम केन्द्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के बाद आपने इस
विश्वविद्यालय की प्रगति और छात्रों के हित के लिए क्या प्रयास किए हैं ?
उत्तर- मैंने मिजोरम केन्द्रीय विश्वविद्यालय को देश के दस शीर्ष विश्वविद्यालयों की सूची में स्थान दिलाने का लक्ष्य रखा है और इसके लिए विश्वविद्यालय में छात्रों के भविष्य के निर्माण और शिक्षा को रोजगारपरक बनाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को दस -पंद्रह नये पाठ्यक्रम शुरू
करने के लिए प्रस्ताव भेजा है, जिनमें प्रमुख पाठ्यक्रम हैं-- खाद्य प्रौद्योगिकी में एमएससी, फार्मेसी, ग्रामीण विकास, अस्पताल प्रबंधन, पर्यटन एवं आतिथ्य प्रबंधन और सार्वजनिक स्वास्थ्य। इसके साथ ही पचुंगा विश्वविद्यालय कैम्पस में दर्शनशास्त्र , मिजो भाषा और लाइफ सांइसेज़ में तीन नये स्नातकोत्तर
पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। विश्वविद्यालय में कृषि विषय भी नहीं है। इसका भी पाठ्यक्रम शुरू करने के लिए आवेदन किया गया है। मिज़ोरम में बच्चों में फुटबॉल के प्रति उत्साह है। इसे देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय मंच देने के वास्ते खेल का पाठ्यक्रम शुरू करने का भी प्रयास है। इसके लिए आवेदन किया गया है।
खेलों के लिए यहां कोई बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं है। इसके लिए विश्वविद्यालय में अलग से एक नया विभाग बनाने की योजना है।
प्रश्न-विश्वविद्यालय क े छात्र अच्छे नागरिक बनकर देश के विकास में योगदान दे सकें, इसके लिए आपकी ओर से क्या प्रयास किए गए हैं ?
उत्तर- छात्रों को शिक्षा के साथ ही उन्हें अच्छा नागरिक बनाना भी जरूरी है। इसके लिए हमने विश्वविद्यालय में कौशल विकास के पाठ्यक्रम और ऑनलाइन पाठ्यक्रम शुरू किए हैं। हमने एक वेबसाइट बनाई है, जिसके माध्यम से छात्रों को रोजगार प्रदान करने के लिए एप्रेंटिस प्रशिक्षण कार्यक्रम
शुरू किया गया है। अभी विश्वविद्यालय में किसी विदेशी भाषा का पाठ्यक्रम नहीं है। इसे शुरू कराने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं।
भविष्य में बेसिक साइंस शुरू करने की भी हमारी योजना है। शिक्षा, समाजशास्त्र ्र, कॅम्प्यूटर, सामाजिक कार्य और मनोविज्ञान-इन छह विषयों को हम संयुक्त रूप से लेकर चलना चाहते हैं यानी एक शब्द में वाइब्रेंट।
यह एक तरह का नोबल कोर्स होगा। इन पाठ्यक्रमों के लिए मिज़ोरम केन्द्रीय विश्वविद्यालय एक पहचान बन जाएगा। हमारी योजना हर सप्ताह एक प्रोजेक्ट सबमिट करने की है।
प्रश्न- मिजोरमवासियों के कल्याण के लिए विश्वविद्यालय की ओर से क्या कोई कार्य किया जा रहा है ?
उत्तर-मिजोरम में चिकित्सा स्वास्थ्य देखरेख की योजनाएं बहुत कम हैं। यहां के लोगों के समुचित इलाज क े लिए कोई बडा अस्पताल भी नहीं है। इसके लिए हमने केन्द्र को यहां मेडिकल कॉलेज खोलने का प्रस्ताव भेजा है। कैंसर के इलाज के लिए एक अस्पताल खोलने और एड्स अनुसंधान केन्द्र स्थापित करने का प्रस्ताव भी भेजा गया है। हमने विश्वविद्यालय के विकास और राज्य के लोगों की भलाई के लिए आठ महीने में 30 से अधिक प्रस्ताव केन्द्र को भेजे हैं। इनमें दस प्रस्तावों को मंजूरी मिल चुकी है। मिज़ोरम में सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता ,जेनेटिक काउंसिलिंंग सेंटर और औद्योगिक प्रौद्योगिकी उद्यान स्थापित करने के लिए भेजे गए प्रस्ताव विचाराधीन हैं।
प्रश्न-अपने जन्मस्थान एवं शिक्षा-दीक्षा के बारे में बताएं ?
उत्तर- मेरा जन्म आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद के नजदीक गुंटूर शहर में 15 अगस्त 1958 मे ं हुआ। मैंने आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद के समीप गुंटूर, मध्यप्रदेश के विदिशा और तिरुपति में अध्ययन किया और फिर अध्यापन कार्य भी किया। गुंटूर में एसपीएस हाई स्क ूल से दसवीं ,जेकेसी कॉलेज से
बॉयोलॉजी और फिजिकल सांइस में बारहवीं की परीक्षा पास की। उसके बाद प्राणिशास्त्र, रसायन शास्त्र और वनस्पति शास्त ्र का अध्ययन किया और गुंटूर के
हिन्द ू कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। चूंकि उस समय आंध्र प्रदेश में तीन-चार विश्वविद्यालय ही थे, जिनमें मुझे जगह नहीं मिल पाई तो मै ंने विदिशा में भोपाल विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में एमएसी किया और फिर आंध्र प्रदेश के तिरुपति में श्रीवेंकेटशराय विश्वविद्यालय से प्राणिशास्त्र में पीचएडी की, जो 1984 में पूरी हुई। उसके बाद आचार्य नागार्जुन विश्वविद्यालय में रिसर्च एसोसिएट बनकर तीन साल काम किया और वहां लेक्चरर की स्थायी नौकरी मिली, जिसे इस समय सहायक
प्रोफेसर कहा जाता है। 1988 मैंने प्राणिशास्त्र और एक्वाकल्चर, एमएसी के छात्रों को पढाया। 1998 में मैं एसोसिएट प्रोफेसर बना, उस समय रीडर कहा जाता था। 2005 में आचार्य नागार्जुन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बना। बीच में पढाई भी शुरू की। चूंकि मैं जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्य कर रहा
था, इसलिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए विश्वविद्यालय ने 1988 में प्राणिशास्त्र ्र विभाग से जैव प्रौद्योगिकी विभाग में मेरा में स्थानांतरण कर दिया। मैंने 2011 में जैव प्रौद्योगिकी में डीएससी यानी डॉक्टर ऑफ साइंस किया ।
इसके साथ ही मैंने आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय से फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भी शोध और फार्मेसी में पीएचडी भी की। जैव प्रौद्योगिकी में डॉक्टर ऑफ साइंस मैंने बरहमपुर विश्वविद्यालय से किया । इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी में एमएससी भी की। उधर मैंने अध्यापन के साथ ही काम किया। मैंने 25
छात्रों का पीएचडी और इतने ही छात्रों का एम. फिल में मार्गदर्शन किया। इसके साथ ही लगभग 225 के करीब शोधपत्र प्रकाशित कराए और लगभग 30 पुस्तकें भी लिखीं। इसलिए विश्वविद्यालय ने मुझे 2014 में प्रशासन में रेक्टार बना दिया। जब 2015 में कुलपति का कार्यकाल समाप्त हुआ तो नये कुलपति के आने तक मुझे चार-पांच महीने विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्य करने का भी अवसर मिला। उसके बाद नवम्बर, 2017 तक रेक्टार प्रतिकुलपति पद पर कार्य करता रहा। उसी दौरान एक समाचारपत्र में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उपाध्यक्ष पद तथा मिजोरम और पांडिचेरी विश्वविद्यालयों में कुलपति
पद के लिए आवदेन देखकर मुझे केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में आवेदन करने का विचार आया और मैंने यूजीसी के वाइस चेयरमैन, मिजोरम के केन्द्रीय विश्वविद्यालय तथा नाइपर के लिए आवेदन किया। पहले मुझे यूजीसी वाइस चेयरमैन के साक्षात्कार के लिए बुलावा आया। शॉर्ट लिस्ट होने पर तीन उम्मीदवारों में मेरा नाम आ गया था लेकिन इसी बीच मिजोरम विश्वविद्यालय में इंटरव्यू के लिए मुझे बुलावा आ गया। यहां 150 मे ं से 14 उम्मीदवारों को
शॉर्ट लिस्ट किया गया, जिसमें मेरा भी नाम आ गया। मेरी किसी ने अनुशंसा नहीं की थी और मैंने कभी सोचा भी नही ं था कि मैं मिजोरम में काम करूंगा ,लेकिन जब मिजोरम विश्विद्यालय की ओर से मुझ सूचना मिली कि मेरा चयन हुआ है और क्या मुझे यहां काम करने में दिलचस्पी है तो मै ं उन्हें हां कह दिया और 16 नवम्बर 2017 को यहां ज्वाइन कर लिया।
प्रश्न- अपने परिवार के बारे में कुछ बताएं । आप हमेशा अध्ययन - अध्यापन और सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहे, परिवार की ओर से आपको इसमें कितना सहयोग मिला ?
उत्तर- मैं अध्ययन समाप्त करने के बाद गुंटूर आ गया और आचार्य नागार्जुन विश्वविद्यालय से नौकरी की शुरूआत की। नौकरी मिलने तक मेरी उम्र 30 साल हो गई थी। उसके बाद मैंने विवाह किया। मेरी पत्नी कृषि विषय में एमएससी है और उन्होंने माइक्रोबॉयलोजी मे ं पीएचडी भी की है। वह गुंटूर में केन्द्र सरकार के वाणिज्य मंत्रालय के अंतर्गत टोबैगो बोर्ड में कार्य करती हैं। मेरा एक पुत्र है,जिसने एमबीबीएस और जनरल मेडिसिन में एमडी किया है। वह इस समय डॉक्टर है और अभी सुपर स्पेशियलिटी के लिए रहा है। मेरा परिवार गुंटूर में ही रहता है। मेरे पिता भी सेंट्रल गवर्नमेंट में
डायरेक्टर ऑफ एग्रीकल्चर एंड मार्केंटिंग में सीनियर मार्केटिंग ऑफिसर थे। अब वह सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इस समय उनकी आयु नब्बे वर्ष है। जहां तक परिवार के सहयोग का प्रश्न है, मुझे अपने परिवार से पूरा सहयोग मिला है अन्यथा मेरे लिए इतना कार्य करना संभव नहीं हो पाता। मेरे मन में शुरू से ही समाज सेवा की भावना थी और इसके लिए मैं सुबह 5 बजे से काम में लग जाता हूं और रात बारह बज े तक काम करता हूं। मेरी पत्नी ही परिवार को संभालती है, जिससे मै ं परिवार की तरफ से निश्चिंत होकर पूरे
मनोयोग के साथ अपने कार्य में लगा रहता हूं।
प्रश्न-मिजोरम विश्वविद्यालय का कुलपति बनने पर विश्वविद्यालय के अधिकारियों और कर्मचारियों तथा स्थानीय निवासियों की क्या प्रतिक्रिया रही ?
उत्तर-मेरे कुलपति बनने की खबर जानने के बाद मेरे पास लगातार शुभकामनाओं के एसएमसएस आने शुरू हो गए। विश्वविद्यालय और उसके बाहर लोगों में खबर फैल गयी थी कि एक बहुत बडे
शिक्षा शास्त्री विश्वविद्यालय के कुलपति बनकर आ रहे हैं। इसी दौरान क ुलपति पद ज्वाइन करने के लिए मिजोरम आते समय एक दिलचस्प घटना हो गई।
मैं कोलकाता में 15 नम्बर को एयरपोर्ट पर बैठा था । उसी समय मिजोरम में कॉलेज में काम करने वाले एक व्यक्ति ने आकर मुझसे पूछा कि क्या आप मिजोरम विश्वविद्यालय के नये वाइस चासंलर है । मैंने पूछा, आपको क ैसे पता लगा तो उसने कहा कि सभी को यह पता है। उसने एयरपोर्ट पर मेरा फ ोटो
लिया और सभी से कहा कि वह मिजोरम क े नये वाइस चासंलर से मिलने वाला पहला व्यक्ति है। मिजोरम पहुंचने पर लगभग 100 व्यक्तियों ने हवाई अड्डे पर मेरी अगवानी की हवाई अडडे पर मुझे अपने बंगले तक पहुंचने में कुछ देरी हो गई थी । विश्वविद्यालय में लगभग 400 लोगों ने मेरा स्वागत किया ।