UP Chunav: पीलीभीत की बीसलपुर सीट, जानें यहां आज तक क्यों नहीं जीत सकी समाजवादी पार्टी

पीलीभीत. उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले की बीसलपुर विधानसभा सीट (Bisalpur Assembly Seat) चार नदियों माला नदी, कटना नदी, देवहा नदी और खन्नौत नदी की लहरों से घिरी हुई है. बीसलपुर में शाहजहांपुर और बरेली की सरहद भी लगती हैं. यहां के चुनावी नतीजे जातीय राजनीतिक लहरे तय करती हैं. इस विधानसभा क्षेत्र की खासियत यह है कि यहां से आज तक समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) का कोई विधायक नहीं चुना गया है. अब देखना यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव (UP Assembly Election 2022) में क्या होता है…

10वीं सदी का देवल शिलालेख, जो 1829 में दियोरिया के निकट इलाहवास देवल में पाया गया था. यह एक संस्कृत शिलालेख है, जो विक्रम संवत (992 या 993 ईस्वी) के वर्ष 1049 का है. इसके साथ-साथ यहां पर राजा मोरध्वज का किला तथा ऐतिहासिक रामलीला मेला यहां की विशेषताएं हैं. जिले की 130 विधानसभा बीसलपुर जिले की चारों विधान सभाओं में इसलिए अहम है, क्योंकि इसी जगह जवाहर नवोदय विद्यालय, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, किसान सहकारी चीनी मिल और जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान स्थित है.

वर्तमान में इस सीट पर भाजपा नेता रामसरन वर्मा गठबंधन के कांग्रेस प्रत्याशी अनीस अहमद खान को हरा कर लगातार दूसरी बार विधायक बने हैं. वह पहले भी भाजपा से दो बार विधायक और मंत्री रह चुके हैं. इस विधानसभा सीट पर 1996 के बाद से भाजपा के रामसरन वर्मा और बसपा के अनीस अहमद का ही कब्जा रहा है. बसपा के अनीस अहमद ने 1996 से 2012 तक लगातार तीन बार जीत हासिल की, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में उनको हार का सामना करना पड़ा और बीजेपी के रामसरन वर्मा जीत गए. तब से वह लगातार इस सीट पर अपना कब्जा जमाए हुए हैं.

बीसलपुर विधानसभा का इतिहास
इस विधानसभा क्षेत्र में पहला चुनाव 1957 में हुआ था. तब बेहारी लाल प्रजा सोसलिस्ट पार्टी की टिकट पर विधायक बने थे. 1962 में कांग्रेस के दुर्गा प्रसाद इस सीट से विधायक बने. 1967 में पीएसपी के एमपी सिंह ने यहां कब्जा किया. वहीं 1969 में तेजबहादुर बीकेडी से और 1974 में कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा पहुंचे. 1977 में मुनेन्द्र पाल सिंह जेएनपी से विधायक बने तो 1977 में जेएनपी से मुनेन्द्र पाल सिंह की किस्मत चमकी. 1980 के विधानसभा चुनाव में तेज बहादुर यहां से तीसरी बार कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने. इसके बाद 1989 में जनता दल के हरीश कुमार ने यहां जीत दर्ज की. इसके बाद वर्ष 1991 के विधानसभा चुनाव में पहली बार BJP का यहां खाता खुला. राम लहर में 1991 के चुनाव में रामसरन वर्मा ने इस सीट पर कब्जा कर लिया. 1993 के चुनाव में भी उन्होंने जीत दर्ज की.

1996 से बढ़ा BSP का वर्चस्व
इसके बाद वर्ष 1996 के विधानसभा चुनाव में समीकरण बदले तो बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार इस सीट पर कब्जा किया. इस चुनाव में अनीस खान विधायक बने. इसके बाद 2002 में भी जनता ने बसपा और अनीस खान पर भरोसा जताया और जीत का तोहफा दिया. वहीं 2007 के चुनाव में भी तीसरी बार बसपा के अनीस खान इस सीट से विधायक बने, जिसके बाद विधानसभा चुनाव 2012 मे फिर भाजपा के रामसरन वर्मा जीते, तब से वह लगातार सीट पर जमे हुए हैं.

कुर्मी वोट पर रहती है नजर
बीसलपुर विधानसभा में लगभग तीन लाख 48 हजार 914 वोटर हैं. इस विधानसभा में लोध व कुर्मी वोट बराबर हैं. यहां पर लगभग 81 हजार लोध, 79 हजार कुर्मी, 61 हजार मुस्लिम, 32 हजार जाटव, 25000 ब्राह्मण ठाकुर, 11000 यादव, 10000 बनिया और 2500 सिख वोटर हैं. इस विधानसभा में लंबे समय तक कुर्मी समाज के नेता विधायक रहे थे, इसलिए इस विधानसभा को कुर्मी बाहुल्य विधानसभा भी कहा जाता है. हालांकि बीते 30 सालों (1991 के बाद) से यहां पर कुर्मी विधायक नहीं बन सका है. बीते 30 सालों से इस विधानसभा सीट पर मुस्लिम और लोध जाति के नेताओं का ही कब्जा रहा है.

सपा को नहीं मिली जीत
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिला की चार विधानसभाओं में से बीसलपुर सीट अपने आप में एक अहम विधानसभा सीट है. इस क्षेत्र में जातीय राजनीति के आधार पर विधानसभा का चुनाव नतीजा तय होता है. सबसे अहम बात यह है कि आज तक समाजवादी पार्टी को यहां से जीत नहीं मिल सकी है. देखते हैं कि क्या इस बार 2022 के विधान चुनाव में समाजवादी पार्टी यहां से जीत का परचम लहरा पाएगी.